Monday, November 29, 2021
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CRPF और CISF में 1979 की घटना का मतलब: क्या प्रयोगशाला बनकर रह गए हैं केंद्रीय अर्धसैनिक बल!

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सार

कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वेलफेयर एसोसिएशन के पदाधिकारी रणबीर सिंह कहते हैं, जब एक खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीत कर लाता है तो सरकारें उन्हें बतौर सम्मान चार, छह से आठ करोड़ रुपये की राशि व अन्य उपहारों से लाद देती हैं। दूसरी ओर जब एक जवान देश के लिए जान कुर्बान करता है, तो उस शहीद परिवार को इस तरह की आर्थिक सहायता नहीं मिल पाती…

CRPF के जवान
– फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)

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कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने ‘सीआरपीएफ’ व ‘सीआईएसएफ’ में ‘1979’ वाली घटना को याद करते हुए कहा है कि आज ‘केंद्रीय अर्धसैनिक बल’ ऊपरी आदेश आजमाने की प्रयोगशाला बनकर रह गए हैं। केंद्र सरकार या गृह मंत्रालय से जब कोई नया आदेश जारी होता है, तो उसे सबसे पहले केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में लागू कर दिया जाता है। जवानों के वेतन भत्ते एवं दूसरी सुविधाओं की बात होती है, तो सरकार मौन साध लेती है। एसोसिएशन के पदाधिकारी रणबीर सिंह ने कहा, क्या देश के लिए जान देने वाले एक जवान की कीमत मात्र 35 लाख रुपये होती है। हाल ही में सीआरपीएफ ने ड्यूटी पर शहीद होने वाले जवानों के परिजनों को जोखिम निधि से मिलने वाली आर्थिक मदद को 21 लाख रुपये से बढ़ाकर 35 लाख रुपये कर दिया है। हालांकि शहादत को तराजू में नहीं तौला जा सकता है और न ही इसका कोई मोल होता, लेकिन शहीदों के परिजनों को एक सम्मानजनक राशि तो मिलनी ही चाहिए। केंद्रीय गृह मंत्रालय को यह आर्थिक सहायता एक करोड़ रुपए कर देनी चाहिए। सरकार को पीएम मोरारजी देसाई के शासनकाल की वह ऐतिहासिक घटना याद रखनी चाहिए, जब असुविधाओं के चलते सीआरपीएफ व सीआईएसएफ में असंतोष भड़का था। अब जरुरी है कि समय रहते सरकार, जवानों के हितों पर ध्यान दे।

आर्थिक मदद को बढ़ा कर एक करोड़ रुपये करने की मांग

कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वेलफेयर एसोसिएशन के पदाधिकारी रणबीर सिंह कहते हैं, जब एक खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीत कर लाता है तो सरकारें उन्हें बतौर सम्मान चार, छह से आठ करोड़ रुपये की राशि व अन्य उपहारों से लाद देती हैं। दूसरी ओर जब एक जवान देश के लिए जान कुर्बान करता है, तो उस शहीद परिवार को इस तरह की आर्थिक सहायता नहीं मिल पाती। एसोसिएशन ने गृह मंत्रालय की जोखिम निधि से मिलने वाली आर्थिक सहायता राशि को बढ़ा कर एक करोड़ रुपये किए जाने की मांग की है। इससे शहीद परिवारों को अपना जीवन यापन करने में आर्थिक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। उन जवानों के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया है।

क्या ‘अर्धसैनिक बल’ एक प्रयोगशाला बन कर गए हैं

ऐसे क्या कारण हैं कि जब भी केंद्र सरकार या गृह मंत्रालय से कोई नया आदेश जारी होता है, तो सबसे पहले उसे केंद्रीय अर्धसैनिक बलों पर आजमाया जाता है। चाहे वह प्रधानमंत्री का ‘लोकल फॉर वोकल’ का संदेश हो, जिसे ‘सेंट्रल पुलिस कैंटीन’ पर थोप दिया गया। आयुष्मान कार्ड जारी करने की बात होती है, मगर इस योजना के अंतर्गत आने वाले अच्छे पैनल अस्पताल नामांकित ही नहीं हैं। रणबीर सिंह के अनुसार, जवानों को एक साल में 100 दिनों की छुट्टी देने की घोषणा हुई थी। इसमें जवानों को अपने परिवार के साथ रहने की बात कही गई थी। अभी तक केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की घोषणा पर अमल नहीं हो सका है। पिछले कई सालों से सुरक्षा बलों के जवानों में ड्यूटी की अधिकता, अत्यधिक तनाव व कई महीनों तक घर और परिवारों से दूर रहने के कारण मानसिक बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इसके चलते बलों में आत्महत्या व आपसी शूटआउट के मामलों में वृद्धि हुई है।

घट रहे हैं पदोन्नति के अवसर

कैडर अफसरों को लंबे समय तक प्रमोशन नहीं मिल पा रहा है। सहायक कमांडेंट से अगले डिप्टी कमांडेंट के रैंक तक पहुंचने के लिए 15 साल लग रहे हैं। बतौर एसोसिएशन, प्रमोशन से वंचित रखने के कारण आईपीएस लॉबी के खिलाफ कैडर अफसरों में अविश्वास की भावना बढ़ती जा रही है। यही हाल सुपरवाइजरी स्टाफ व अन्य कर्मियों का है। सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बावजूद ऑर्गेनाइज्ड सर्विस का संवैधानिक दर्जा न दिया जाना काफी चिंता का विषय है। निचले कमेरे वर्ग, फालोवर्स रैंक व ट्रेडमैन में कैडर रिव्यू नहीं हो पा रहा है। पहले जवान, सात-आठ साल के बाद बटालियनों से दूसरी जगहों पर बदले जाते थे। अब जवान को तीन-चार साल के बाद ही दूसरी बटालियन में पोस्टिंग दे दी जाती है। जब तक जवान एक दूसरे को समझने की कोशिश करते हैं, तब तक जवान की बदली हो जाती है। यह भी शूटआउट या आत्महत्या का मुख्य कारण है। सुविधाओं की कमी एवं पुरानी पेंशन के न मिलने के कारण अर्धसैनिक बलों में उच्च अधिकारियों से लेकर निम्न कर्मचारियों में निराशा का माहौल है। पेंशन बहाली, कैडर रिव्यू, ऑर्गेनाइज्ड सर्विस, राशन मनी व अन्य सुविधाओं के लिए जवान एवं अफसर कोर्ट कचहरियों के चक्कर काट रहे हैं व इतना कुछ होने पर गृह मंत्रालय मौन है।

सफेद हाथी बना कल्याण एवं पुनर्वास एवं बोर्ड

पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों एवं रिटायर्ड परिवारों के लिए गृह मंत्रालय के अधीन ‘कल्याण एवं पुनर्वास एवं बोर्ड’ का गठन किया गया था। आज के दौर में यह बोर्ड सफेद हाथी साबित हो रहा है। अभी हाल ही में गृह मंत्रालय द्वारा पैरामिलिट्री फोर्स को सिविलियन फोर्स करार देना, एक निंदनीय विषय रहा है। पैरामिलिट्री परिवार ने ऐसे आदेश जारी करने वालों की घोर निंदा की है। रिटायर्ड एडिशनल डीजी एचआर सिंह ने कहा, केंद्र सरकार द्वारा अर्धसैनिक बलों के प्रति किए जा रहे सौतेले व्यवहार व जायज मांगों को लेकर बापू की समाधि राजघाट पर 14 फरवरी 2022 को शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन किया जाएगा। अर्धसैनिक बलों की मांगों को लेकर राष्ट्रपति तक ज्ञापन सौंपा जा चुका है, लेकिन अभी तक किसी मांग पर कोई चर्चा तक नहीं हो रही है। इससे जाहिर होता है कि केंद्र सरकार का अर्धसैनिक बलों की जायज मांगों से कोई लेना-देना नहीं है। अर्धसैनिक कल्याण बोर्ड, अर्धसैनिक झंडा दिवस कोष व अर्धसैनिक स्कूलों की स्थापना, ऐसी मांगों की तरफ ध्यान न देने का मतलब सरकार की अनिच्छा को प्रकट करता है।

विस्तार

कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने ‘सीआरपीएफ’ व ‘सीआईएसएफ’ में ‘1979’ वाली घटना को याद करते हुए कहा है कि आज ‘केंद्रीय अर्धसैनिक बल’ ऊपरी आदेश आजमाने की प्रयोगशाला बनकर रह गए हैं। केंद्र सरकार या गृह मंत्रालय से जब कोई नया आदेश जारी होता है, तो उसे सबसे पहले केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में लागू कर दिया जाता है। जवानों के वेतन भत्ते एवं दूसरी सुविधाओं की बात होती है, तो सरकार मौन साध लेती है। एसोसिएशन के पदाधिकारी रणबीर सिंह ने कहा, क्या देश के लिए जान देने वाले एक जवान की कीमत मात्र 35 लाख रुपये होती है। हाल ही में सीआरपीएफ ने ड्यूटी पर शहीद होने वाले जवानों के परिजनों को जोखिम निधि से मिलने वाली आर्थिक मदद को 21 लाख रुपये से बढ़ाकर 35 लाख रुपये कर दिया है। हालांकि शहादत को तराजू में नहीं तौला जा सकता है और न ही इसका कोई मोल होता, लेकिन शहीदों के परिजनों को एक सम्मानजनक राशि तो मिलनी ही चाहिए। केंद्रीय गृह मंत्रालय को यह आर्थिक सहायता एक करोड़ रुपए कर देनी चाहिए। सरकार को पीएम मोरारजी देसाई के शासनकाल की वह ऐतिहासिक घटना याद रखनी चाहिए, जब असुविधाओं के चलते सीआरपीएफ व सीआईएसएफ में असंतोष भड़का था। अब जरुरी है कि समय रहते सरकार, जवानों के हितों पर ध्यान दे।

आर्थिक मदद को बढ़ा कर एक करोड़ रुपये करने की मांग

कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वेलफेयर एसोसिएशन के पदाधिकारी रणबीर सिंह कहते हैं, जब एक खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीत कर लाता है तो सरकारें उन्हें बतौर सम्मान चार, छह से आठ करोड़ रुपये की राशि व अन्य उपहारों से लाद देती हैं। दूसरी ओर जब एक जवान देश के लिए जान कुर्बान करता है, तो उस शहीद परिवार को इस तरह की आर्थिक सहायता नहीं मिल पाती। एसोसिएशन ने गृह मंत्रालय की जोखिम निधि से मिलने वाली आर्थिक सहायता राशि को बढ़ा कर एक करोड़ रुपये किए जाने की मांग की है। इससे शहीद परिवारों को अपना जीवन यापन करने में आर्थिक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। उन जवानों के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया है।

क्या ‘अर्धसैनिक बल’ एक प्रयोगशाला बन कर गए हैं

ऐसे क्या कारण हैं कि जब भी केंद्र सरकार या गृह मंत्रालय से कोई नया आदेश जारी होता है, तो सबसे पहले उसे केंद्रीय अर्धसैनिक बलों पर आजमाया जाता है। चाहे वह प्रधानमंत्री का ‘लोकल फॉर वोकल’ का संदेश हो, जिसे ‘सेंट्रल पुलिस कैंटीन’ पर थोप दिया गया। आयुष्मान कार्ड जारी करने की बात होती है, मगर इस योजना के अंतर्गत आने वाले अच्छे पैनल अस्पताल नामांकित ही नहीं हैं। रणबीर सिंह के अनुसार, जवानों को एक साल में 100 दिनों की छुट्टी देने की घोषणा हुई थी। इसमें जवानों को अपने परिवार के साथ रहने की बात कही गई थी। अभी तक केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की घोषणा पर अमल नहीं हो सका है। पिछले कई सालों से सुरक्षा बलों के जवानों में ड्यूटी की अधिकता, अत्यधिक तनाव व कई महीनों तक घर और परिवारों से दूर रहने के कारण मानसिक बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इसके चलते बलों में आत्महत्या व आपसी शूटआउट के मामलों में वृद्धि हुई है।

घट रहे हैं पदोन्नति के अवसर

कैडर अफसरों को लंबे समय तक प्रमोशन नहीं मिल पा रहा है। सहायक कमांडेंट से अगले डिप्टी कमांडेंट के रैंक तक पहुंचने के लिए 15 साल लग रहे हैं। बतौर एसोसिएशन, प्रमोशन से वंचित रखने के कारण आईपीएस लॉबी के खिलाफ कैडर अफसरों में अविश्वास की भावना बढ़ती जा रही है। यही हाल सुपरवाइजरी स्टाफ व अन्य कर्मियों का है। सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बावजूद ऑर्गेनाइज्ड सर्विस का संवैधानिक दर्जा न दिया जाना काफी चिंता का विषय है। निचले कमेरे वर्ग, फालोवर्स रैंक व ट्रेडमैन में कैडर रिव्यू नहीं हो पा रहा है। पहले जवान, सात-आठ साल के बाद बटालियनों से दूसरी जगहों पर बदले जाते थे। अब जवान को तीन-चार साल के बाद ही दूसरी बटालियन में पोस्टिंग दे दी जाती है। जब तक जवान एक दूसरे को समझने की कोशिश करते हैं, तब तक जवान की बदली हो जाती है। यह भी शूटआउट या आत्महत्या का मुख्य कारण है। सुविधाओं की कमी एवं पुरानी पेंशन के न मिलने के कारण अर्धसैनिक बलों में उच्च अधिकारियों से लेकर निम्न कर्मचारियों में निराशा का माहौल है। पेंशन बहाली, कैडर रिव्यू, ऑर्गेनाइज्ड सर्विस, राशन मनी व अन्य सुविधाओं के लिए जवान एवं अफसर कोर्ट कचहरियों के चक्कर काट रहे हैं व इतना कुछ होने पर गृह मंत्रालय मौन है।

सफेद हाथी बना कल्याण एवं पुनर्वास एवं बोर्ड

पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों एवं रिटायर्ड परिवारों के लिए गृह मंत्रालय के अधीन ‘कल्याण एवं पुनर्वास एवं बोर्ड’ का गठन किया गया था। आज के दौर में यह बोर्ड सफेद हाथी साबित हो रहा है। अभी हाल ही में गृह मंत्रालय द्वारा पैरामिलिट्री फोर्स को सिविलियन फोर्स करार देना, एक निंदनीय विषय रहा है। पैरामिलिट्री परिवार ने ऐसे आदेश जारी करने वालों की घोर निंदा की है। रिटायर्ड एडिशनल डीजी एचआर सिंह ने कहा, केंद्र सरकार द्वारा अर्धसैनिक बलों के प्रति किए जा रहे सौतेले व्यवहार व जायज मांगों को लेकर बापू की समाधि राजघाट पर 14 फरवरी 2022 को शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन किया जाएगा। अर्धसैनिक बलों की मांगों को लेकर राष्ट्रपति तक ज्ञापन सौंपा जा चुका है, लेकिन अभी तक किसी मांग पर कोई चर्चा तक नहीं हो रही है। इससे जाहिर होता है कि केंद्र सरकार का अर्धसैनिक बलों की जायज मांगों से कोई लेना-देना नहीं है। अर्धसैनिक कल्याण बोर्ड, अर्धसैनिक झंडा दिवस कोष व अर्धसैनिक स्कूलों की स्थापना, ऐसी मांगों की तरफ ध्यान न देने का मतलब सरकार की अनिच्छा को प्रकट करता है।

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