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Bastar Dussehra: 75 दिन का ऐतिहासिक पर्व, कांटों के झूले पर झूलेंगी ‘देवी’, होंगी खास रस्में

विदेशों में भी फेमस है बस्तर का दशहरा.

अमावस्या के दिन राजमहल से राजपरिवार के सदस्य लाव लश्कर के साथ पैदल काछन गुडी तक पहुंचते हैं जहां बेल कांटो के झूले पर झूल रही काछन देवी से अनुमति लेने के बाद बस्तर दशहरे (Bastar Dussehra,) की विधिवत शुरूआत होती है और बस्तर दशहरे में किसी तरह का कोई विध्न न हो इसके लिए देवी से प्राथर्ना की जाती है.

बस्तर. छत्तीसगढ़ के बस्तर में 75 दिनों तक मनाया जाने वाला विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा (Bastar Dussehra) अपने आप में खास है. पचहत्तर दिनों तक हर दिन सैकड़ों सालों से निभाई जा रही रस्म भी खास है, जिसे बस्तर के आदिवासी सैकड़ों सालों से उसी रूप में मनाते चले आ रहे हैं. बस्तर दशहरे की विधिवत अनुमति देने के लिए बस्तर दशहरें की सबसे खास रस्म है काछन गादी, जिसे निभाने के लिए इस बार भी पनिका जाति की कन्या उपवास रखेगी. आने वाले 16 अक्टूबर को पनिका जाति की कन्या अनुराधा पर कथित तौर पर काछन देवी का वास होगा. अमावश्या के दिन राजपरिवार के सदस्य राजमहल से पैदल चलकर काछनगुडी पहुचेंगे जहां बेल कांटों के झूले में झूल रही काछनदेवी से विधिवत बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति लेंगे.

इस रस्म को पूरा करने के दौरान बस्तर की बुजुर्ग महिलाए विशेष प्रकार के बस्तरिया वाघ यंत्र के जरिए देवी देवताओं का जगार गीत गाकर आव्हान करती हैं. हालांकि इस बार कोरोना का संक्रमण फैला हुआ है. इस वजह से जिला प्रशासन ने जो आदेश दिए हैं उसके तहत काछन देवी की इस रस्म को आम लोग नहीं देख पाऐंगे. केवल रस्म में भाग लेने वाले ही शामिल हो पाएंगे. कोरोना की वजह से बस्तर ही नहीं देश विदेश से आने वाले पर्यटकों भी इस बार यहां नहीं पहुंचेंगे.
विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे की खास रस्म काछनगादी 

आदिवासी बाहुल्य बस्तर जहां संस्कृति बोली भाषा से लेकर मनाए जाने वाले तीज त्योहार अपने आप में खास है. इन्हीं में खास बस्तर का विश्व प्रसिद्ध दशहरा है जो लगभग 600 सालों से उसी परम्परा का निर्वाह करते हुए मनाया जा रहा है. समय के बदलने के साथ सब कुछ बदल जाता हैं, लेकिन ऐतिहासिक विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा आज भी उसी रूप में कायम है. बस्तर दशहरे की सबसे खास रस्म है काछनगादी. इस रस्म को पूरा करने के लिए बड़े मारेंगा गांव से इस बार भी पनिका जाति की कन्या अनुराधा पर कथित तौर पर रण की देवी काछन देवी सवार होंगी जो राजपरिवार के सदस्य को आशीर्वाद देकर बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति देंगी. इस समय अनुराधा ने कठिन तप उपवाास रखा हुआ है. अनुराधा के मुताबिक वह देवी की सेवा करती हैं इसलिए ये व्रत रखना जरूरी होता है. बीते पांच सालों से अनुराधा इस रस्म को निभा रही हैं. कठिन तप साधना के साथ इस रस्म को निभाने वाली अनुराधा काछन गुडी पहुंच चुकी है. कक्षा छठवीं में पढ़ रही अनुराधा बहुत ज्यादा इस बारे में नहीं जानती. उसे बस इतना मालूम है कि वे देवी पूजा के लिए आई है. अनुराधा पर काछन देवी कैसी सवार होती है उस दौरान क्या कुछ होता है, ये उसे कुछ भी मालूम नहीं रहता है. अनुराधा बड़े होकर शिक्षक बनना चाहती हैं.

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बस्तर दशहरे की सबसे खास रस्म है काछनगादी. इस रस्म को पूरा करने के लिए बड़े मारेंगा गांव से इस बार भी पनिका जाति की कन्या अनुराधा पर कथित तौर पर रण की देवी काछन देवी सवार होंगी जो राजपरिवार के सदस्य को आशीर्वाद देकर बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति देंगी.

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क्या है इसका इतिहास

इतिहासकार हेमंत कश्यप और राजपरिवार के सदस्य कमल चन्द भंजदेव के मुताबिक 600 पहले बस्तर महाराजा ने इस परम्परा को शुरू किया था. बताते हैं कि इस रस्म के पीछे इतिहास में कई तरह की बाते हैं. कहा जाता है कि काछनदेवी रण की देवी कहलाती है और उनकी आराधना के लिए इस रस्म को किया जाता है, तो वहीं ये भी कहा जाता है कि रैला और काछन नाम की दो रानियां जब मुगलों ने बस्तर राज पर हमला किया उस दौरान इन दोनों ही रानियों ने अपने को बचाने के लिए आत्मदाह कर लिया था. उसी समय से ये परम्परा चली आ रही है कि अमावस्या के दिन राजमहल से राजपरिवार के सदस्य लाव लश्कर के साथ पैदल काछन गुडी तक पहुंचते हैं जहां बेल कांटो के झूले पर झूल रही काछन देवी से अनुमति लेने के बाद बस्तर दशहरे की विधिवत शुरूआत होती है और बस्तर दशहरे में किसी तरह का कोई विध्न न हो इसके लिए देवी से प्राथर्ना की जाती है. जिस काछनगुडी में इस रसम का पूरा किया जाता है उस काछन गुडी का निर्माण 1772 चालुक्य वंश के राजाओं ने कराया था. अठारवीं शताब्दी में बना कांछन गुडी आज भी उसी रूप में है.

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जिस काछनगुडी में इस रसम का पूरा किया जाता है उस काछन गुडी का निर्माण 1772 चालुक्य वंश के राजाओं ने कराया था. अठारवीं शताब्दी में बना कांछन गुडी आज भी उसी रूप में है.

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बेल कांटों में झूलती है नाबालिग कन्या

बताया जाता है कि काछनदेवी की रस्म को पनिका जाति की कन्या ही पूरा करती है. जब तक कन्या नाबालिग होती है तब तक इस रसम को निभाती है उसके बाद फिर उसी समाज या परिवार से दूसरी नाबालिग कन्या को ये जिम्मेदारी दी जाती है. अपने पिता शिव प्रसाद और दादा सुकलू के साथ पहुंची अनुराधा के लिए परिवार के लोग भी इस रस्म को पूरा करने में लगे हुए हैं. परिवार के लोग मानते हैं कि एक कांटा अगर पैर में लग जाए तो इंसान चीखने लगता है, लेकिन सैंकड़ों बेल कांटे से तैयार झूले में झूलने वाली कन्या को काछन देवी की शक्ति मिलती है. यही वजह है कि वह बिना किसी तकलीफ के इस रस्म को पूरा करती है. इस रस्म से एक खास चीज और जुउी है वह है जगार संगीत. काछन गुडी में इस रस्म को पूरा करने के लिए पूरे 9 दिनों तक बुजुर्ग महिलाऐं मटके और लकड़ी के सूपे से बना पारम्परिक वाघयंत्र को बजाकर देवी का आव्हान करती है. कहा जाता है कि बस्तर जुबान में इस यंत्र का धनकुल वाघ यंत्र कहा जाता है जिसके संगीत की प्रतिघ्वनि से काछन देवी बालिका पर सवार होती है.

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