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सेब की ग्रेडिंग में भी बागबानों के साथ मनमर्जी, पिछले साल 160 रुपए थे दाम, अब वसूले जा रहे 180 रुपए प्रति पेटी

शिमला2 दिन पहले

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  • पहले ही कॉर्टन के दाम बढ़े हैं, वहीं अब ग्रेड अाैर पैक करने के भी दाम बढ़ा दिए गए हैं

बागबानाें के साथ जहां मंडियाें में फरेब हाे रहा है, अब सेबाेत्पादक क्षेत्राें में लगी ग्रेडिंग पैकिंग की मशीनाें में भी रेट बढ़ा दिए गए हैं। पिछले साल एक पेटी ग्रेडिंग और पैकिंग करने के बागबानों से 160 रुपए लिए जा रहे थे, इस बार इसे बढ़ा दिया गया है। अब बागबानों से 180 रुपए लिए जा रहे हैं।

ऐसे में अपनी मनमर्जी से ही रेट बागबानों के लिए बढ़ाया गया है। इससे बागबानों को खासा नुकसान झेलना पड़ रहा है। जहां पहले ही कॉर्टन के दाम बढ़े हैं, वहीं अब ग्रेड और पैक करने के भी दाम बढ़ा दिए गए हैं। बागबानों ने सरकार से मांग की है कि इस पर चेक रखा जाए और एक फिक्स रेट तय किए जाएं। ताकि, ग्रेडिंग पैकिंग मशीन पर बागबानों बागबानों सही रेट मिल सके।

सरकार को इस टेक्नोलॉजी को बढ़ाना चाहिए। ग्रेडिंग मशीन से एक दिन में 200 से अधिक पेटियां भरी जा सकती हैं। किसान सभा का कहना है कि सरकार बागबानों बागबानों के लिए काेई विकल्प निकालना चाहिए। ताकि, इस तरह का फरेब न हाे। ग्रेडिंग और पैकिंग करवाना जरूरी हाेता है, ऐसे में इसके लिए नियम बनाए जाएं।

एपीएमसी एप्पल ग्रेडिंग मशीन का नहीं मिल रहा फायदाः​​​​​​

ऊपरी शिमला के सेब बाहुल्य क्षेत्र के बागबानों को सुविधा देने के लिए कुमारसैन के निकट ओडी में एपीएमसी द्वारा आधुनिक एप्पल ग्रेडिंग पैकिंग प्लांट स्थापित किया गया है। यहां पर काफी कम दाम पर ग्रेडिंग पैकिंग की जाती थी।

फिलहाल, इसका पूरा लाभ बागवानों को नहीं मिल पा रहा है। इस एप्पल ग्रेडिंग पैकिंग प्लांट को इटली से करीब दो करोड़ रुपये की कीमत में आयातित किया गया था। यह अत्याधुनिक प्लांट कुछ समय तो ठीक चला लेकिन पिछले तीन, चार वर्ष से सेब का सीजन आते ही खराब हाेने लगता है। ऐसे में बागबानों के पास काेई विकल्प नहीं बचा है।

घर पर सेब ग्रेडिंग-पैकिंग के लिए नहीं मिल रहे मजदूर

सेब काराेबार पूरी तरह से नेपाली मूल के लाेगाें पर ही निर्भर है। सेब का बगीचा तैयार करने से लेकर सेब बागबानों मार्केट तक पहुंचाने का काम अधिकांश बागबान नेपाली मजदूराें से करवाते है। सेब का तुड़ान, उसकी पैकिंग, ग्रेडिंग, ढुलाई सब लेबर पर ही डिपेंड है।

काेराेना संक्रमण के कारण अब लेबर का न मिलना बागबानों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। यही नहीं कई बागबानों ने अपने बगीचाें बागबानों नेपाली लाेगाें के हवाले कर रखा था और खुद शहराें में नाैकरी करते थे। अब बागबानों के पास मजदूराें की कमी के चलते ग्रेडिंग पैकिंग के लिए मशीनाें का सहारा ही लेना पड़ रहा है।

1.13 लाख हेक्टेयर में हाेता है उत्पादनः हिमाचल में 1 लाख 13 हजार 154 हेक्टेयर क्षेत्र में 3 लाख 68 हजार 603 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन हाेता है। सेब का अधिक उत्पादन जिला शिमला, किन्नाैर, मंडी, कुल्लू में अधिक हाेता है और ये पूरी तरह से लेबर प र ही डिपेंड है। अकेले शिमला जिला में सेब के कुल उत्पादन का 60 से 65 प्रतिशत सेब उत्पादन हाेता है।


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