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सियासत में दो दरवाजे खोल कर रखते हैं नीतीश!: पलटूराम नाम रखने वाली राजद भी तैयार, DNA पर सवाल उठाने वाली भाजपा साथ है ही

पटना30 मिनट पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद

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नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री, बिहार

‘अगर चाहें तो गोली मरवा सकते हैं और कुछ नहीं कर सकते।’ लालू प्रसाद ने 2021 में दो सीटों पर हुए विधान सभा के उपचुनाव में नीतीश कुमार के विसर्जन की बात कही थी। जिस पर नीतीश कुमार ने यह बयान दिया था। अब वही राजद, नीतीश कुमार को भाजपा कोटे के मंत्रियों को बर्खास्त करने की सलाह दे रही है। वहीं, राजद नीतीश कुमार को समर्थन देने के लिए भी तैयार है। यही नीतीश कुमार की खासियत है कि उनके लिए दो दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं या वे वैसी राजनीतिक परिस्थितियां बना कर रखते हैं कि उनके लिए दो दरवाजे हमेशा खुले रहें।

अभी की राजनीति में भाजपा का दरवाजा तो उनके लिए खुला ही है। वे भाजपा के साथ हैं ही। लेकिन, राजद और कांग्रेस के दरवाजे भी उनके लिए खुले हुए हैं। उन बयानों को भूल जाइए, जिसमें नीतीश कुमार ने कहा था कि मिट्टी में मिल जाएंगे पर भाजपा के साथ नहीं जाएंगे। लालू परिवार ने नीतीश कुमार का नाम पलटू राम रख दिया वह भी भूल जाइए। भास्कर ने नीतीश की पार्टी और उनके विरोधी नेताओं से नीतीश की राजनीति पर बात की।

दबाव में काम नहीं करते नीतीश कुमार !
लोग बताते हैं कि नीतीश कुमार राजनीति में दो दरवाजे हमेशा खोल कर रखते हैं। इसे इस रुप में आप समझ सकते हैं कि वे कम सीटों के बावजूद मुख्यमंत्री ही नहीं बन जाते बल्कि सहयोगी पार्टी के दबाव में काम नहीं करते। थोड़ा इतिहास में चलें और 80 के दशक से लेकर अब तक नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा पर गौर करें तो पाएंगे कि 79 में जब जनता पार्टी टूटी तो सत्येन्द्र नारायण सिंह के साथ रहते हुए वे किशन पटनायक वाले लोहिया विचार मंच से जुड़े रहे।

लोहिया विचार मंच में रहते हुए वे जनता पार्टी से संबद्ध रहे। इसके बाद वे लोकदल में गए। वहां से कर्पूरी ठाकुर वाले लोकदल में आ गए। तब लालू प्रसाद भी लोकदल (च) में थे। उस समय नीतीश कुमार ने लोकदल से चुनाव भी लड़ा था। 1990 में लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री बनाने में नीतीश कुमार की भी भूमिका रही। 94 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी बना ली। इसके बाद उन्होंने 2003 में जेडीयू का निर्माण किया।

जदयू की सीटें ज्यादा हों या कम, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही

2005 के विधान सभा चुनाव में राजद की अगुआई वाल संप्रग गठबंधन को मात दी और बिहार के मुख्यमंत्री बने। 2010 के चुनाव में जदयू को 115 और भाजपा को 91 सीटें आईं। नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने। लेकिन जब भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को पीएम कंडिडेट घोषित किया तो नीतीश कुमार को गुस्सा आ गया और उन्होंने गठबंधन तोड़ दिया। दरवाजा उन्होंने खुला रखा था और उस दरवाजे का प्रयोग कर राजद-कांग्रेस के साथ हो गए।

2015 में महागठबंधन को 178 सीटें आईं। लेकिन 2017 आते-आते नीतीश पर लालू प्रसाद की पार्टी का दबाव बढ़ने लगा और उन्होंने अपने पुराने दुश्मन का दरवाजा इस्तेमाल किया। 2020 में नीतीश कुमार ने भाजपा, हम और वीआईपी का साथ लिया। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू की 28 सीटें घट गईं और वह 43 पर आ गई जबकि भाजपा की 21 सीटें बढीं और वह 74 पर पहुंच गई। इसके बावजूद भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया। एनडीए को 125 सीटें मिलीं और महागठबंधन को 110 सीटें।

दलों के बीच दुश्मनी के बीच दरवाजा भी खुला रखते हैं

राजनीति में व्यक्तिगत दुश्मनी भले नीतीश निभाते हैं। लेकिन, दलों के बीच की दुश्मनी वे समय के साथ भुलाते रहे हैं। नीतीश कुमार के शुभचिंतक कहते हैं कि यह उनकी राजनीतिक ताकत है कि लालू जैसे दुश्मन भी उनके लिए राजनीतिक दरवाजा खोल कर रखते हैं। नरेन्द्र मोदी डीएनए पर सवाल करने के बाद भी साथ देते हैं। इससे सोनिया-राहुल को भी उनसे गुरेज नहीं।

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बिहार | दैनिक भास्कर

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