Wednesday, December 8, 2021
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राष्ट्र विरोधी नारेबाजी: अलगाववादी नेता सेहराई के बेटों को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, याचिका रद्द

सार

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने अलगाववादी नेता मोहम्मद अशरफ सेहराई के दो बेटों और अन्य की याचिका रद्द कर दी। यह मामला मई में कुपवाड़ा जिले में हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता के अंतिम संस्कार के दौरान राष्ट्रविरोधी नारे लगाने का है। 
 

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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने वीरवार को अलगाववादी नेता स्वर्गीय मोहम्मद अशरफ सेहराई के दो बेटों और अन्य आरोपियों द्वारा गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत दायर एक मामले में विशेष अदालत द्वारा जमानत याचिका खारिज करने के खिलाफ दायर एक अपील को खारिज कर दिया। यह मामला इस साल मई में कुपवाड़ा जिले में हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता के अंतिम संस्कार के दौरान राष्ट्रविरोधी नारे लगाने का है।

अशरफ सेहरई मुजाहिद सेहराई (33), उनके भाई- राशिद सेहराई (35) और अन्य आरोपी व्यक्तियों ने 14 अगस्त को गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम में बारामुला के विशेष न्यायालय द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद अपील दाखिल की थी।

यह मामला 6 मई 2021 को दर्ज किया गया था। जब अशरफ के इंतकाल के बाद कुपवाड़ा के सुगाम इलाके में उनके गांव तकीपोरा तुलखान में सुपुर्द-ए-खाक किए जाने के दौरान कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ राष्टविरोधी नारे लगाए और घटना का वीडियो भी तैयार किया। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया और हुर्रियत कांफ्रेंस (जी) नेता के दो बेटों सहित आरोपी व्यक्तियों को 16 मई को हिरासत में ले लिया।

जमानत के लिए आरोपियों ने स्पेशल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि 19 जुलाई को विशेष अदालत ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यूएलए (पी) अधिनियम की धारा 43-डी में निहित जमानत के प्रावधान में शामिल नहीं है। क्योंकि मामले की जांच पूरी नहीं हुई है। आरोपियों ने हाई कोर्ट में इस फैसले को इस आधार पर आदेश को चुनौती दी थी कि उनके खिलाफ यूएलए (पी) अधिनियम की धारा 18 के तहत अपराध को विशेष अदालत के समक्ष कोई साक्ष्य नहीं था।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जिस समय विशेष अदालत ने 90 दिनों से अधिक की जांच और हिरासत की अवधि में विस्तार दिया था, वे पहले ही 90 दिनों से अधिक समय तक हिरासत में बिता चुके थे और इस तरह, वे स्वाभाविक रूप से जमानत देने के हकदार थे। अपील के लंबित रहने के दौरान, मामले की जांच पूरी हो गई और विशेष अदालत के समक्ष आरोप पत्र दायर किया गया।

आरोपी के वकील ने कहा कि वह केवल 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करने में चूक के आधार पर अपील को जमानत देने के सवाल तक सीमित रखना चाहते हैं।
 
याचिकाकर्ताओं को पुन: अपील का मौका
न्यायमूर्ति अली मोहम्मद माग्रे और न्यायमूर्ति संजय धर ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है जहां विशेष न्यायाधीश ने लोक अभियोजक की रिपोर्ट पर विचार कर जांच की अवधि और अपीलकर्ताओं / अभियुक्तों की हिरासत में विस्तार पर सहमति जताई। अत: इस मामले में विशेष न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश स्पष्ट और उचित है।

खंडपीठ ने कहा कि विशेष अदालत का आदेश, जिसके तहत आरोपी की नजरबंदी की अवधि को 90 दिनों से आगे बढ़ा दिया गया है जो कानून सम्मत है। हमें याचिका में कोई दम नहीं नजर आता और इसे खारिज किया जाता है। हालांकि अदालत ने कहा, चूंकि मामले की जांच पूरी हो चुकी है।

 

आरोप पत्र पहले ही विशेष अदालत के समक्ष रखा जा चुका है ऐसे में हम अपीलकर्ताओं को मौका देते हैं कि आरोपी बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए गुण-दोष के आधार पर जमानत के लिए विशेष अदालत का दरवाजा खटखटाएं। 

विस्तार

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने वीरवार को अलगाववादी नेता स्वर्गीय मोहम्मद अशरफ सेहराई के दो बेटों और अन्य आरोपियों द्वारा गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत दायर एक मामले में विशेष अदालत द्वारा जमानत याचिका खारिज करने के खिलाफ दायर एक अपील को खारिज कर दिया। यह मामला इस साल मई में कुपवाड़ा जिले में हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता के अंतिम संस्कार के दौरान राष्ट्रविरोधी नारे लगाने का है।

अशरफ सेहरई मुजाहिद सेहराई (33), उनके भाई- राशिद सेहराई (35) और अन्य आरोपी व्यक्तियों ने 14 अगस्त को गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम में बारामुला के विशेष न्यायालय द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद अपील दाखिल की थी।

यह मामला 6 मई 2021 को दर्ज किया गया था। जब अशरफ के इंतकाल के बाद कुपवाड़ा के सुगाम इलाके में उनके गांव तकीपोरा तुलखान में सुपुर्द-ए-खाक किए जाने के दौरान कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ राष्टविरोधी नारे लगाए और घटना का वीडियो भी तैयार किया। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया और हुर्रियत कांफ्रेंस (जी) नेता के दो बेटों सहित आरोपी व्यक्तियों को 16 मई को हिरासत में ले लिया।

जमानत के लिए आरोपियों ने स्पेशल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि 19 जुलाई को विशेष अदालत ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यूएलए (पी) अधिनियम की धारा 43-डी में निहित जमानत के प्रावधान में शामिल नहीं है। क्योंकि मामले की जांच पूरी नहीं हुई है। आरोपियों ने हाई कोर्ट में इस फैसले को इस आधार पर आदेश को चुनौती दी थी कि उनके खिलाफ यूएलए (पी) अधिनियम की धारा 18 के तहत अपराध को विशेष अदालत के समक्ष कोई साक्ष्य नहीं था।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जिस समय विशेष अदालत ने 90 दिनों से अधिक की जांच और हिरासत की अवधि में विस्तार दिया था, वे पहले ही 90 दिनों से अधिक समय तक हिरासत में बिता चुके थे और इस तरह, वे स्वाभाविक रूप से जमानत देने के हकदार थे। अपील के लंबित रहने के दौरान, मामले की जांच पूरी हो गई और विशेष अदालत के समक्ष आरोप पत्र दायर किया गया।

आरोपी के वकील ने कहा कि वह केवल 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करने में चूक के आधार पर अपील को जमानत देने के सवाल तक सीमित रखना चाहते हैं।

 

याचिकाकर्ताओं को पुन: अपील का मौका

न्यायमूर्ति अली मोहम्मद माग्रे और न्यायमूर्ति संजय धर ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है जहां विशेष न्यायाधीश ने लोक अभियोजक की रिपोर्ट पर विचार कर जांच की अवधि और अपीलकर्ताओं / अभियुक्तों की हिरासत में विस्तार पर सहमति जताई। अत: इस मामले में विशेष न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश स्पष्ट और उचित है।

खंडपीठ ने कहा कि विशेष अदालत का आदेश, जिसके तहत आरोपी की नजरबंदी की अवधि को 90 दिनों से आगे बढ़ा दिया गया है जो कानून सम्मत है। हमें याचिका में कोई दम नहीं नजर आता और इसे खारिज किया जाता है। हालांकि अदालत ने कहा, चूंकि मामले की जांच पूरी हो चुकी है।

 

आरोप पत्र पहले ही विशेष अदालत के समक्ष रखा जा चुका है ऐसे में हम अपीलकर्ताओं को मौका देते हैं कि आरोपी बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए गुण-दोष के आधार पर जमानत के लिए विशेष अदालत का दरवाजा खटखटाएं। 

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