Monday, November 29, 2021
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गांव को ओलिंपिक मेडल दिलाने का जुनून: शादी नहीं की, घर भी छोड़ दिया, देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर के 11 पहलवान दिए, हंसराज ब्रह्मचारी ने नाहरी को बनाया पहलवानों का गांव

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राई (सोनीपत)9 मिनट पहलेलेखक: देवेंद्र शर्मा

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अखाड़े में पहलवानों की नई पीढ़ी तैयार करने में जुटे हैं ब्रह्मचारी।

  • हंसराज के अखाड़ा में 150 पहलवान सीख रहे दांव-पेच, 25 साल से युवाओं को दे रहे प्रशिक्षण
  • रवि दहिया और अर्जुन अवॉर्डी अमित दहिया भी इसी गांव से हैं

खेल के लिए जुनून ऐसा कि शादी नहीं की और घर तक छोड़ दिया, लेकिन इसी त्याग के बूते उन्होंने देश को टोक्यो ओलिंपिक सिल्वर मेडलिस्ट रवि दहिया व अर्जुन अवॉर्डी अमित दहिया समेत अंतरराष्ट्रीय स्तर के 11 पहलवान दिए। हम बात कर रहे हैं सोनीपत के गांव नाहरी के हंसराज ब्रह्मचारी की। जिन्होंने अपने गांव को पहलवानों का गांव बना दिया है। बस सोते-जागते एक ही सपना देखा था कि गांव में ओलिंपिक मेडल आए।

1970 में जन्मे हंसराज बताते हैं, ‘शुरुआत से ही पहलवानी का शौक था। स्कूल स्तर पर नेशनल कुश्ती गेम्स में गोल्ड मेडल जीता था। गांव में ही युवाओं को प्रशिक्षण मिल सके, इसलिए 1996 में अखाड़ा शुरू किया। फिर महसूस हुआ कि परिवारिक जिम्मेदारियों के चलते शिष्यों से न्याय नहीं कर पाऊंगा। इसीलिए 2000 में घर छोड़ दिया। अखाड़ा गांव के बाहर शुरू किया। शिष्यों की उपलब्धि देखकर आज गर्व होता है। अभी 150 से ज्यादा पहलवान सीखने आते हैं। हंसराज के भाई रामनिवास ने बताया कि हंसराज ने एमसीडी की नौकरी छोड़ दी थी। इन्हीं पैसों से गांव में कुएं व नलकूप लगाए। वे जिसे बोलते हैं, वही अखाड़े में जरूरत का सामान भेज देता है। आपसी सहयोग और हंसराज का सम्मान ही इस अखाड़े को चला रहा है।

गांव के नाम ओलिंपिक मेडल न होना खलता था

हंसराज बताते हैं कि कई शिष्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कर चुके थे। पर गांव के नाम एक भी ओलिंपिक मेडल न होना खलता था। अमित से भी उम्मीद बंधी थी, इस बार रवि पर पूरा दारोमदार था। उन्होंने सपना पूरा कर दिया। शादी न करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि गांव को पहचान दिलाने के लिए ब्रह्मचारी जीवन का फैसला लिया। हम अखाड़े में पैसा नहीं कमाते, बस सेवा करते हैं। सबसे बड़ी बात अखाड़े के संचालन के लिए गांव के संपन्न लोग ही मदद करते हैं।

रवि छह साल की उम्र से अखाड़े में जाने लगा,10 साल प्रैक्टिस की

पहलवान रवि दहिया के पिता राकेश दहिया बताते हैं, ‘रवि छह साल की उम्र में हंसराज जी के पास सीखने के लिए अखाड़े में गया था। 10 साल तक उसने गांव में ही मिट्‌टी के अखाड़े में अभ्यास किया। हंसराज जी ही रवि को छत्रसाल स्टेडियम में लेकर गए थे। वहीं से उसका ओलिंपिक का सफर शुरू हुआ। उधर, पहलवान अमित दहिया ने कहा कि मेरे पहले गुरु हंसराज ही हैं। उन्होंने ही मुझे ओलिंपिक तक पहुंच पाया। हमारे जैसे कई युवा पहलवान आज जो कुछ हैं, उन्हीं की बदौलत हैं।

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हरियाणा | दैनिक भास्कर

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