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खुलासा : लैंगिक भेदभाव के कारण हर छठी लड़की की मौत, फिर भी बढ़ी बेटियों की संख्या, बदल रही लोगों की सोच

नई दिल्ली. लैंगिक समानता (Gender Equality) के मामले में भारत की गिनती हमेशा से ही फिसड्डी देशों में होती रही है. महिलाओं-बेटियों से अपराध (Crime with women) की बातें बेहद आम हैं. लेकिन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज (International Institute for Population Sciences) का शोध (Research) कुछ और ही इशारा कर रहा है. इस रिसर्च से पता चलता है कि बेटियों को लेकर देश के लोगों का विचार बदल रहा है. एक ओर जहां बेटियों की संख्या पिछले 3 दशक से बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर बेटों की चाहत भी कम हो रही है. यानी, लोगों की नजर में अब बेटे-बेटियों में ज्यादा अंतर नहीं दिख रहा. हालांकि, रिसर्च के मुताबिक हर साल लगभग 1 करोड़ 20 लाख बेटियों का जन्म होता है, लेकिन 15 साल की उम्र होते-होते 30 लाख की मौत हो जाती है. इनमें से हर छठी लड़की की मौत लैंगिक भेदभाव के कारण होती है.

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज के इस शोध का नेतृत्व मुंबई के जनसंख्या विज्ञान संस्थान के प्रोफेसर हरिहर साहू (Harihar Sahoo) और रंगासामी नागराजन (Rangasamy Nagarajan) ने किया. उनके मुताबिक, इस सर्वे को 1992 से लेकर 2016 के बीच किया गया, जिसमें 8 लाख 88 हजार परिवार की लगभग 10 लाख महिलाओं ने हिस्सा लिया. इन्हें निरक्षर, शिक्षित, धार्मिक और जातीय आधार पर चार हिस्सों में बांटा गया. ये सर्वे भी 4 चरण में पूरा किया गया.

सर्वे में बेटे-बेटियों का तुलनात्मक अध्ययन
चार चरणों में लगभग 3 दशक तक चले इस रिसर्च में बेटे की चाहत अधिक और कम वाले राज्यों में ऐसे परिवारों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया, जिनकी सिर्फ 1 बेटी है या फिर वो बेटा नहीं चाहते. इसमें यह पता चला कि जिन लोगों की दो बेटियां थीं और कोई बेटा नहीं था, वैसे 33.6% घरों में परिवार नियोजन के तरीकों को अपनाया गया. इतना ही नहीं, जिन घरों में बेटियां हैं, वो परिवार भी बेहद शिक्षित और आर्थिक तौर पर सम्पन्न है. रिसर्च के मुताबिक, सर्वे के पहले चरण यानी 1992 में सिर्फ 16 प्रतिशत कपल्स ही परिवार नियोजन के स्थायी तरीके इस्तेमाल करते थे. तब जिनकी 3 बेटियां थीं और कोई बेटा नहीं था, वैसे दंपतियों की संख्या 20 प्रतिशत थी. लेकिन, सरकार द्वारा बेटियों को लेकर लगातार चलाए जा रहे जागरूकता अभियान और बदलते सोच की वजह से लगभग 30 साल बाद यह आंकड़ा 34 प्रतिशत तक पहुंच गया. हालांकि, वैसी महिलाएं ज्यादा हैं, जो एक बेटे की खातिर परिवार नियोजन का रास्ता नहीं अपनाना चाहतीं. वहीं, दो बेटों के जन्म के बाद लगभग 60 प्रतिशत दंपति ने नसबंदी कराने को प्राथमिकता दी.यहां बढ़ी बेटियों की संख्या

देश की ज्यादातर शिक्षित आबादी शहरों में रहती है, जिन्हें पता है कि बेटे-बेटियों में कोई अंतर नहीं होता. सर्वे में भी ये बात साबित हुई है. शहरों में जहां सिंगल डॉटर्स वाले फैमिली मेम्बर्स की संख्या बढ़ी है, वहीं गांवों में ऐसी चाहत रखने वाले परिवारों की संख्या 25 प्रतिशत से भी कम पाई गई. हालांकि, शहर एवं गांव के उच्च शिक्षा वाली फैमिली में बेटियों की चाहत रखने वालों की संख्या 1.6 गुना से बढ़कर 2.2 गुना हो गई है. महाराष्ट्र में एक बेटी वाले परिवार 26%, दो बेटी के परिवार 63.4% और तीन बेटी के परिवार 71.5% हैं. इसमें एक बेटी वाली फैमिली के मामले में मुंबई 47.7 प्रतिशत के साथ टॉप पर है. केरल में एक बेटी वाले परिवार 36.8%, दो बेटी के परिवार 85% और तीन बेटी के परिवार 84.9% हैं. इसमें एक बेटी वाली फैमिली के मामले में पलक्कड़ 70.3 प्रतिशत के साथ टॉप पर है. वहीं, हरियाणा में एक बेटी वाले परिवार 27.3%, दो बेटी के परिवार 41.4% और तीन बेटी के परिवार 40.6% हैं. सिंगल डॉटर्स के मामले में पंचकुला 43.4 प्रतिशत के साथ टॉप पर है. पंजाब में 10 साल में एक बेटी वाले परिवार 21%, दो बेटियों वाले परिवार 37% व तीन बेटियों वाले परिवार 45% बढ़े हैं.

सर्वे में ये भी पाया गया कि हरियाणा और पंजाब देश की औसत लैंगिक समानता से काफी पीछे हैं, लेकिन वहां पर धीरे-धीरे सुधार हो रहा है. साल 2001 में पंजाब में जहां 1 हजार बेटों के सामने 798 बेटियां थीं, वहीं 2011 में यह आंकड़ा 846 तक पहुंच गया. वहीं, हरियाणा में 2001 में यह औसत प्रति हजार 819 था, जो 2011 में बढ़कर 830 तक पहुंच गया.




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