कुलपतियों की नियुक्ति या पॉलिटिकल पोस्टिंग: UP की 30 स्टेट यूनिवर्सिटी में 73% सवर्ण कुलपति, SC सिर्फ 3%; क्योंकि सिलेक्‍शन राजभवन करता है

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16 घंटे पहले

उत्तर प्रदेश की 30 स्टेट यूनिवर्सिटी में 22 सवर्ण कुलपति हैं। यानी 73% से भी ज्यादा। पिछड़ा वर्ग, यानी OBC के 6 हैं, प्रतिशत निकालेंगे तो 20%। श‌ेड्यूल्ड कास्ट यानी SC कैटेगरी के सिर्फ एक वाइस चांसलर हैं। यह 3% हुए। कुलपतियों का कार्यकाल 3 से 5 साल होता है। मौजूदा सभी 30 कुलपति BJP सरकार में नियुक्त हुए हैं। क्या ये सिलेक्‍शन नॉर्मल हैं या इनमें राजनीतिक पोस्टिंग भी है। आइए पूरे प्रोसेस को परत-दर-परत देखते हैं-

लिस्ट देखी आपने? हमने भी देखी। जब हमने सिलेक्‍शन प्रोसेस की पड़ताल में कई जरूरी बातें सामने आई हैं। आइए एक-एक करके इन पर बात करते हैं।

UGC का सिलेक्‍शन प्रोसेस अभी यूपी तक नहीं पहुंचा
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यानी UGC ने कुलपति चुनने के जो नियम बना रखे हैं, वो आज तक UP में लागू ही नहीं हो पाए हैं। हमने जो ढूंढा, वो बताने से पहले, आपकी राय जानना चाहते हैं।

आज तक UGC का कोई नामित प्रतिनिधि UP में रहा ही नहीं
दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर और कानपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. अशोक कुमार बताते हैं, “उत्तर प्रदेश में आज तक कोई भी UGC का नामित प्रतिनिधि नहीं रहा। असल में ये प्रतिनि‌धि ही UGC के नियम-कानूनों को फॉलो कराते हैं। फिर?”

हर बार सर्च कमेटी बनाकर, खुद गर्वनर ही अध्यक्ष चुन लेते हैं
UGC के बदले गर्वनर हाउस हर बार कुलपति चुनने के लिए 3 मेंबर्स की सर्च कमेटी बनाते हैं। इसका अध्यक्ष गर्वनर खुद चुनते हैं। इसके अलावा इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या फिर उनकी ओर से मनोनीत सदस्य होता है। फिर जिस यूनिवर्सिटी का कुलपति चुना जाना है, उसके एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य होते हैं।

कमेटी अखबारों को विज्ञापन तो देती है कि कुलपति की पोस्ट खाली है, लेकिन… ये कमेटी विज्ञापन निकालती है कि कुलपत‌ि की पोस्ट खाली है, बायोडाटा भेजो। इस विज्ञापन के मुताबिक पूरे कागज-पत्र और इंटरव्यू चलते हैं। आखिर में कमेटी 2 से 5 नाम सिलेक्ट करके राज्यपाल को बता देती है। इसमें 3 महीने लगेंगे, ऐसा विज्ञापन में लिखा रहता है, लेकिन ऐसा होता नहीं है। सब कुछ होने के बाद भी कई बार छह महीने तक कुलपति तय नहीं हो पाते।

खुलेआम कोई बताता नहीं, लेकिन हर बार वही VC नहीं बनता है, जो नाम कमेटी देती है
सर्च कमेटी के काम और सिलेक्‍शन पर प्रो. अशोक कुमार 20 जनवरी 2020 का एक लेख है- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए कौन जिम्मेदार। उन्होंने लिखा, “चयन प्रकिया में पैनल के सदस्य अपनी तरफ से किसी शिक्षाविद का नाम नहीं चुनते हैं, लेकिन अंतिम सिलेक्‍शन राज्य सरकार की ओर से आई सिफारिश से हो जाता है। इसलिए हमेशा यह संदेह बना रहता है कि कुलपतियों का चयन उनकी योग्यता से होता है या फिर किसी राजनीतिक कारणों से। इसी वजह से इस प्रक्रिया का खुला विरोध होता रहा है।”

30 में सिर्फ 1 SC कुलपति क्यों?
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी JNU के स्कूल ऑफ सोशल साइंस यानी CSSS विभाग के प्रो. विवेक कुमार बताते हैं, “पहले यूनिवर्सिटी में केवल एसोसिएट प्रोफेसर पद के लिए ही आरक्षण लागू था, लेकिन साल 2006 से UGC ने अपने मानकों में सुधार किया। तब प्रोफेसर के पदों पर आरक्षण को लागू हुआ। साल 2007 में उत्तर प्रदेश में मायावती आईं। उन्होंने कहा कि आरक्षण को सही से लागू करो, नहीं तो ठीक नहीं होगा। तब जाकर कहीं प्रदेश के विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति के प्रोफेसर्स आने शुरू हुए।”

ऐसा नहीं है कि SC प्रोफेसर योग्य नहीं, दरअसल- पॉलिटिकल पोस्टिंग की जा रही है
प्रो. विवेक कुमार कहते हैं, “उत्तर प्रदेश तो एक राज्य है, लेकिन देश की 43 सेंट्रल यूनिवर्सिटीज का भी यही हाल है। किसी तरह से साल 2020 में टीवी कट्टिमणि को आंध्र प्रदेश के केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय का पहला कुलपति नियुक्त किया गया था। फिलहाल सेंट्रल यूनिवर्सिटीज में नियुक्त होने वाले वो इकलौते अनुसूचित जाति के कुलपति हैं।”

उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “SC कुलपति न होने के पीछे कारण ये नहीं है कि कुलपति के पद के लिए लोग उपलब्ध नहीं हैं, बल्कि मुख्य कारण यह है कि अब नियुक्त प्रक्रिया में कैंडिडेट की योग्यता को दरकिनार कर पॉलिटिकल पोस्टिंग की जा रही हैं।”

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देश | दैनिक भास्कर

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