Wednesday, December 8, 2021
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कागजी दावों की खुली पोल: मेयर और नगर आयुक्त झगड़ते रहे, गंदा हुआ शहर, स्वच्छता रैंकिंग में 30 से 38वें स्थान पर पहुंची रांची

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रांचीएक घंटा पहले

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  • नगर निगम के अधिकारियों ने 3 स्टार रैंकिंग का प्रस्ताव भेजा था पर मापदंड पूरा नहीं किया, न जनता का भरोसा जीत पाए, न सफाई मित्रों की सुरक्षा पर काम किया

किसी भी प्रदेश की पूरी तस्वीर उसकी राजधानी हाेती है। राजधानी रांची से पूरे झारखंड की छवि बनती-बिगड़ती है। लेकिन, इन दिनों राजधानी को संवारने का जिम्मा जिनके उपर है, वेलोग आपसी लड़ाई में व्यस्त हैं। रांची नगर निगम में मेयर-नगर आयुक्त के बीच चल रहे विवाद से पूरे शहर का बंटाधार हो गया। रांची को रमणीक बनाने का दावा उस समय हवा-हवाई हो गया, जब शनिवार को केंद्रीय शहरी आवासन मंत्रालय ने स्वच्छता सर्वेक्षण-2021 के परिणाम की घोषणा की। राज्यों की कैटेगरी में झारखंड ने पहला स्थान लाया। शहरों की सूची में रांची को किसी कैटेगरी में कोई अवार्ड नहीं मिला।

विवाद से रांची की रैंकिंग में जबर्दस्त गिरावट आई। पिछले वर्ष देशभर के शहरों में रांची 30वें स्थान पर था, इस बार के सर्वेक्षण में 8 पायदान पिछलकर 38वें स्थान पर पहुंच गया। जबकि, सफाई पर निगम प्रतिमाह करीब 4 करोड़ खर्च कर रहा है। निगम के अधिकारियों ने 3 स्टार रैंकिंग देने के लिए प्रस्ताव भेजा था। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को तीन कैटेगरी में बांटकर लागू करने सहित पूरे शहर में शौचालय बनाने, उसे गूगल मैप से जोड़ने, सड़कों की सफाई मैकेनाइज्ड कराने का दावा किया गया था। इसके बावजूद केंद्रीय टीम ने रांची को स्वच्छ शहरों के पैमाने पर खड़ा नहीं पाया।

3 बड़ी वजह रांची के खराब प्रदर्शन के लिए

1. मेयर-नगर आयुक्त में नहीं बनती है। शहर के विकास पर पिछले डेढ़ वर्षों में एकमत से कोई प्लान नहीं बना। जनप्रतिनिधि और अफसर लड़ने में समय गवां दिए। पार्षदों ने भी सफाई को लेकर कभी आवाज नहीं उठाया।

2. सीडीसी कंपनी घरों से कूड़ा नहीं उठाता। ऐसे में लोगों को कूड़ा सड़क-नाली में फेंकना पड़ता है। जोनटा कंपनी को डस्टबिन लगाना था, पर यह काम नहीं हुआ।

3. गेल इंडिया के साथ झिरी में 700 मिट्रिक टन कूड़ा का निपटारा करके बायो डीजल का उत्पादन करने के लिए एग्रीमेंट किया गया। लेकिन, प्लांट नहीं लगा।

घर से बाजार तक स्वच्छता का मॉडल बना इंदौर

  • घर को जीरो वेस्ट बनाने में हरेक व्यक्ति का योगदान है। घर से निकलने वाले कूड़ा को 6 हिस्सों में बांटते हैं। सूखा कचरा 2.50 रुपए किलो में एनजीओ को देते हैं। गीला कचरा को खाद बनाकर घर में सब्जी-फूल उगाते हैं।
  • इंदौर के बाजार में स्ट्रीट फूड जोन में दुकानदारों ने 500 किलो प्रतिदिन गीला कचरा प्रोसेस करने का प्लांट लगा दिया। इससे बनने वाला खाद उपहार में भेंट करते हैं।
  • 1200 टन कचरा रोजाना निकलता है इंदौर शहर में, जो रांची से दोगुना है। लेकिन, सफाई के लिए 11 हजार से अधिक सफाई मित्र तैनात हैं। जबकि, रांची में रोजाना करीब 700 टन कचरा निकलता है, लेकिन मात्र 2 हजार सफाई कर्मचारियों के जिम्मे शहर है।

20 करोड़ सालाना कचरा से कमा रहा इंदौर
इंदौर देश का इकलौता शहर है, जहां कचरा से निपटने पर खर्च में कमी आ रही है। सालाना 20 करोड़ कमाई भी कर रहा है। इसमें कार्बन क्रेडिट, सीएनजी कंपोस्ट खाद, सीएंडडी वेस्ट व सूखा कचरा से शामिल है।

सफाई कंपनी की लापरवाही से ऐसे हालात हुए हैं। तालमेल का अभाव और झिरी में कूड़ा डंपिंग यार्ड में वेस्ट रिसाइकिलिंग प्लांट नहीं लगने से प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। हालांकि, निगम की टीम ने अच्छा रैंक लाने के लिए मेहनत की थी। अब अगले वर्ष बेहतर प्रदर्शन करेंगे। -आशा लकड़ा, मेयर

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झारखंड | दैनिक भास्कर

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