Wednesday, December 8, 2021
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अमेरिका को गढ़ने में भारतीयों के योगदान की अनकही कहानियां: ‘अवर स्टोरीज’ में, राजनीति व आर्किटेक्चर से लेकर अधिकार दिलाने तक का संघर्ष शामिल

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एक घंटा पहलेलेखक: बोस्टन से भास्कर के लिए श्रेया सरकार

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पारिवारिक एलबम, चिटि्ठयों और मौखिक इतिहास से दक्षिण एशियाई लोगों की भूमिका का पता लगाने में 13 साल से जुटे हैं समीप मलिक।

‘आज जो अमेरिका दुनिया की महाशक्ति बना है, वो अकेले के दम पर नहीं हुआ। इसमें बड़ी संख्या में दक्षिण एशियाई लोगों खासकर भारतीयों का भी बड़ा योगदान है। इन लोगों की कहानियां अमेरिकी स्कूलों में नहीं पढ़ाई जातीं, किताबों और मीडिया में भी नहीं मिलती।’ यह कहना है भारतीय अमेरिकी समीप मलिक का। इस योगदान को अमेरिका के घरों, स्कूलों, यूनिवर्सिटी और लाइब्रेरी तक पहुंचानेे की जिम्मेदारी मलिक ने ली है। इसके लिए उन्होंने साउथ एशियन अमेरिकन डिजिटल आर्काइव (साडा) की नींव रखी।

पिछले 13 वर्षों से मलिक पारिवारिक एलबमों, चिटि्ठयों और मौखिक इतिहास से कहानियां जुटा रहे हैं। हाल ही में इस संकलन को ‘अवर स्टोरीज: एन इंट्रोडक्शन टू साउथ एशियन अमेरिका’ शीर्षक से किताब के रूप में प्रकाशित किया गया है। इसमें दक्षिण एशियाई लोगों के अमेरिका में 1780 से अब तक के महत्वपूर्ण योगदान को समेटा गया है। ऐसी ही एक महत्वपूर्ण शख्सियत हैं भगत सिंह थिंड, वे अमेरिका पहुंचने वाले शुरुआती प्रवासियों में से एक थे।

1920 में उन्हें अमेरिकी नागरिकता दी गई। पर जल्द ही इसे चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने भारतीयों को अश्वेत होने के कारण नागरिकता के लिए अपात्र पाया। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में उनका केस यूएस विरुद्ध भगत सिंह (1923) इतिहास का सबसे चर्चित केस बन गया। थिंड की इस चुनौती के बाद दो दशक तक दक्षिण एशियाई लोगों ने संघर्ष किया। थिंड ने देशभर में लोगों को जागरूक किया। आखिरकार 1946 में भारतीयों को नागरिकता मिलने का रास्ता साफ हुआ। दूसरा बड़ा नाम फजलुर रहमान खान का है। तत्कालीन कलकत्ता में जन्मे खान को अमेरिकी स्काईस्क्रेपर में ट्यूबुलर डिजाइन का जनक माना जाता है।

किताब में कलाकारों, विद्वान से लेकर शिक्षकों तक की भूमिका

मलिक बताते हैं,‘अमेरिका में दक्षिण एशियाई मूल के 54 लाख से ज्यादा लोग हैं। पर इस समुदाय के योगदान की कहानियां ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलती। जिन्होंने अमेरिका को इस ऊंचाई पर लाने में मदद की, उनकी कहानियां शक्तिशाली हैं, जानबूझकर इन्हें सामने नहीं आने दिया गया। इस किताब में दक्षिण एशियाई अमेरिकी खासकर भारतीयों के अनुभवों, नागरिक जुड़ाव से लेकर परिवार और उनके योगदान की कहानियां समेटी गई हैं। इसमें 64 लेखकों की मदद ली गई हैं। इनमें विद्वान, कलाकार, पत्रकार और दक्षिण एशियाई समुदाय के अहम लोग शामिल हैं।

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विदेश | दैनिक भास्कर

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